बक्सर: बुढ़वा शिव मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन आचार्य रणधीर ओझा ने सुनाई भगवान के चौबीस अवतारों की प्रेरक कथा


बक्सर। नगर के चरित्रवन स्थित बुढ़वा शिवजी मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन शुक्रवार को आचार्य श्री रणधीर ओझा ने भगवान के चौबीस अवतारों की कथा और समुद्र मंथन प्रसंग को अत्यंत रोचक एवं सारगर्भित ढंग से प्रस्तुत किया।
आचार्य रणधीर ओझा ने कहा कि यह संसार भगवान का एक सुंदर बगीचा है, जिसमें चौरासी लाख योनियों के रूप में भिन्न-भिन्न प्रकार के फूल खिले हुए हैं। जब भी कोई अपने दुष्कर्मों से इस बगीचे को दूषित करने की चेष्टा करता है, तब भगवान स्वयं अवतार लेकर सज्जनों का उद्धार और दुर्जनों का संहार करते हैं।
🌊 समुद्र मंथन की गहराई से व्याख्या
समुद्र मंथन की कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा — “मानव हृदय ही संसार सागर है।”
मनुष्य के भीतर उठने वाले अच्छे और बुरे विचार ही देवता और दानव के रूप में मंथन करते हैं। जब भीतर सत्कर्मों का चिंतन होता है तो मनुष्य ऊपर उठता है, और जब कुकर्मों का प्रभाव होता है तो उसका जीवन अंधकारमय हो जाता है।
🙏 सती चरित्र और ध्रुव कथा से मिला जीवन संदेश
भागवत कथा के दौरान सती चरित्र प्रसंग को सुनाते हुए उन्होंने बताया कि भगवान शिव की बात न मानकर सती जब अपने पिता के घर गईं, तो अपमानित होकर स्वयं को अग्नि में समर्पित करना पड़ा। इस प्रसंग से उन्होंने संदेश दिया कि अहंकार और अवज्ञा हमेशा विनाश की ओर ले जाती है।
इसके बाद ध्रुव चरित्र की कथा सुनाते हुए आचार्य रणधीर ओझा ने कहा कि अपमान सहने के बाद भी ध्रुव की माता सुनीति ने धैर्य नहीं खोया, जिससे एक बड़ा संकट टल गया।
उन्होंने कहा कि परिवार को सुरक्षित रखने के लिए धैर्य और संयम आवश्यक गुण हैं।
उन्होंने बताया कि बालक ध्रुव की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें वैकुंठ लोक का स्थान प्रदान किया। इससे यह संदेश मिलता है कि भक्ति के लिए न तो कोई आयु सीमा होती है और न ही कोई वर्ग भेद — भक्ति बचपन से ही करनी चाहिए, क्योंकि वही समय जीवन की दिशा निर्धारित करता है।
🌺 सत्कर्म ही देता है मोक्ष का मार्ग
आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति को जिस प्रकार के कर्म करता है, उसी के अनुरूप उसकी मृत्यु और गंतव्य तय होती है।
उन्होंने कहा कि जब-जब संसार में पाप बढ़ता है, तब-तब भगवान किसी न किसी रूप में धरती पर अवतरित होकर धर्म की रक्षा करते हैं।
उन्होंने कहा कि कलियुग में भी अगर मनुष्य भगवान श्रीकृष्ण के बताए मार्ग पर चले, तो उसका जीवन सफल और सार्थक हो सकता है।
कथा के अंत में उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति पाप कर बैठता है, तो श्रीमद्भागवत के अनुसार उसका श्रेष्ठ उपाय “प्रायश्चित” है — जो मनुष्य को पुनः धर्म मार्ग पर ले आता है।



