
बक्सर. भारत में स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के पुनरुद्धार, जनजातीय विरासत, सांस्कृतिक निरंतरता एवं सामाजिक परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में बक्सर जिले के शोधार्थियों ने सहभागिता करते हुए अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए. संगोष्ठी का आयोजन 11 एवं 12 सितंबर को जनजाति अध्ययन केंद्र, ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज, प्रयागराज की ओर से किया गया. कार्यक्रम हाइब्रिड माध्यम (ऑफलाइन एवं ऑनलाइन) से संपन्न हुआ.
संगोष्ठी में बक्सर जिले से शोधार्थी अविनाश कुमार वर्मा, विशाल कुमार चौधरी, विश्वकर्मा यादव, विश्वकर्मा कुमार, राजू कुमार गुप्ता एवं कुमार निहाल ने सहभागिता की. शोधार्थियों ने स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों, जनजातीय सांस्कृतिक विरासत एवं सामाजिक परिवर्तन से जुड़े विषयों पर अकादमिक विमर्श में अपना योगदान दिया.
अविनाश कुमार ने स्वदेशी ज्ञान की प्रासंगिकता पर रखा पक्ष

संगोष्ठी के दौरान शोधार्थी अविनाश कुमार ने भारतीय स्वदेशी एवं जनजातीय ज्ञान परंपराओं की महत्ता, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा बदलते सामाजिक परिवेश में इन ज्ञान प्रणालियों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां केवल अतीत की विरासत नहीं हैं, बल्कि इनमें प्रकृति, समाज, संस्कृति एवं जीवन-पद्धति से जुड़ा अनुभवजन्य ज्ञान का भंडार है. यह ज्ञान वर्तमान समय में भी सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास के लिए उपयोगी हो सकता है.
उन्होंने जनजातीय समुदायों की पारंपरिक जीवन-पद्धति, प्रकृति के साथ सामंजस्य, लोकज्ञान एवं सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण तथा उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि आधुनिक विकास के साथ स्थानीय एवं स्वदेशी ज्ञान को जोड़कर सांस्कृतिक निरंतरता और समावेशी सामाजिक परिवर्तन की दिशा में प्रभावी कार्य किया जा सकता है.
बक्सर के शोधार्थियों की अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में सहभागिता को जिले की शैक्षणिक एवं शोध गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है. इस प्रकार के अकादमिक मंच पर भागीदारी से जिले में शोध एवं उच्च शिक्षा के प्रति बढ़ती रुचि भी परिलक्षित होती है.




