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महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय बक्सर में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन, अस्मितामूलक विमर्श में साहित्य की भूमिका पर हुआ मंथन

Pouबक्सर। महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग एवं आईक्यूएसी के संयुक्त तत्वावधान में ‘महर्षि विश्वामित्र व्याख्यानमाला – ज्ञान सत्र 04’ के अंतर्गत “अस्मितामूलक विमर्श में साहित्य की भूमिका” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन मानस भवन सभागार में संपन्न हुआ।

कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। सर्वप्रथम डॉ. श्वेत प्रकाश ने सभी आगंतुकों एवं वक्ताओं का औपचारिक स्वागत किया। इसके पश्चात डॉ. छाया चौबे ने विषय प्रवर्तन करते हुए मुख्य वक्ता प्रोफेसर (डॉ.) मृत्युंजय सिंह का सारगर्भित परिचय प्रस्तुत किया।

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) मृत्युंजय सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि साहित्य मात्र सौंदर्यबोध का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हाशिए पर खड़े समाज को अस्मिता और पहचान दिलाने का सशक्त वैचारिक औजार है। उन्होंने साहित्य को सामाजिक न्याय और वैचारिक प्रतिरोध का प्रभावी माध्यम बताया।

विशिष्ट वक्ता एवं विश्वविद्यालय के पूर्व कुलसचिव प्रोफेसर (डॉ.) रणविजय कुमार ने कहा कि साहित्य समाज में सत्ता के विरुद्ध काउंटर नरेटिव खड़ा करता है और वंचित तबकों की आवाज को मंच प्रदान करता है। उनका विस्तृत परिचय डॉ. श्वेत प्रकाश द्वारा प्रस्तुत किया गया।

प्रख्यात विद्वान एवं कथाकार नर्मदेश्वर (परिचय: डॉ. अर्चना कुमारी) ने उत्तर-आधुनिकतावाद और एडवर्ड सईद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि “होने का अर्थ केवल अपने लिए होना नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी होना है।” उन्होंने राहत इंदौरी की चर्चित पंक्तियों के माध्यम से युवाओं को सामाजिक सरोकारों से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।

अध्यक्षीय संबोधन में महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर (डॉ.) के.के. सिंह ने अस्मितामूलक विमर्श के विभिन्न आयामों पर विद्वत्तापूर्ण प्रकाश डाला। उन्होंने स्त्री विमर्श को पश्चिमी भौतिकवादी दृष्टिकोण से भिन्न बताते हुए भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संदर्भ में परिभाषित किया। दलित विमर्श पर चर्चा करते हुए उन्होंने मुल्कराज आनंद के उपन्यास के पात्र भाखा के जीवन संघर्ष का उदाहरण प्रस्तुत किया। वहीं आदिवासी विमर्श के संदर्भ में उन्होंने “आदिवासी बचाओ यानी जंगल बचाओ” के मूल मंत्र पर विशेष बल दिया।

इस गरिमामय संगोष्ठी में महाविद्यालय के प्राध्यापकगण डॉ. योगर्षि राजपूत, डॉ. सैकत देवनाथ, डॉ. अमन कुमार सिंह, डॉ. दीपक कुमार, डॉ. अर्चना मिश्रा, डॉ. रवि प्रभात, डॉ. महेंद्र प्रताप सिंह, डॉ. अरविंद वर्मा, डॉ. अवनीश कुमार पांडेय, डॉ. सुजीत कुमार, डॉ. जयप्रकाश मिश्रा, डॉ. इसरार आलम, डॉ. रवि ठाकुर सहित शिक्षक एवं शिक्षकेत्तर कर्मचारी, बड़ी संख्या में शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के अंत में संगोष्ठी के संयोजक एवं हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. पंकज कुमार चौधरी ने सभी आगंतुकों, वक्ताओं एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। राष्ट्रगान के साथ संगोष्ठी का विधिवत समापन हुआ।

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